शनिवार, 24 जनवरी 2026
सत्ता की राजनीति बनाम जनता के असली सवाल
संपादकीय :
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य जनता को सशक्त करना था, वही व्यवस्था आज जनता को आपस में उलझाकर सत्ता को सुरक्षित रखने का माध्यम बनती जा रही है। चुनाव दर चुनाव, सरकार दर सरकार, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन शासन की मूल प्रवृत्ति लगभग वही रहती है — विभाजन करो, भावनाएँ भड़काओ और असली मुद्दों को हाशिये पर डाल दो।
कुछ वर्ष पहले देश को यह बताया गया कि “हिन्दू खतरे में है।” यह नारा केवल एक धार्मिक चिंता नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का प्रवेश द्वार था। जनता को यह विश्वास दिलाया गया कि यदि सत्ता एक विशेष हाथ में नहीं रही, तो आस्था, संस्कृति और पहचान नष्ट हो जाएगी। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि खतरा हिन्दू को किसी और से नहीं, बल्कि हिन्दू को ही हिन्दू से लड़वाकर पैदा किया जा रहा है।
आज समाज को देखें तो वह अनेक परतों में बँटा हुआ दिखाई देता है। ये विभाजन स्वाभाविक नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक प्रयोगशालाओं में गढ़े गए हैं।
हिन्दू को हिन्दू से लड़ाने की राजनीति काशी जैसे धार्मिक नगरों से शुरू होती है, जहाँ आस्था और प्रशासन को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है। मंदिर, पुरोहित, परंपरा और विकास के नाम पर टकराव पैदा किया जाता है। बहस इस बात पर नहीं होती कि आम नागरिक को क्या मिला, बल्कि इस पर होती है कि कौन ज़्यादा बड़ा आस्थावान है।
इसके बाद बारी आती है सवर्ण और दलित के बीच टकराव की। किसी एक घटना या विवाद को पूरे समाज का प्रतिनिधि बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। न्याय की प्रक्रिया धीमी रहती है, लेकिन राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़। परिणाम यह होता है कि पीड़ित को न्याय नहीं मिलता, लेकिन समाज दो ध्रुवों में बँट जाता है।
संतों को संतों से लड़वाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। अखाड़ों, मठों और धार्मिक परंपराओं को प्रतिस्पर्धा और श्रेष्ठता की लड़ाई में झोंक दिया जाता है। जो संस्थाएँ समाज को जोड़ने का कार्य करती थीं, उन्हें भी राजनीतिक खेमों में बाँट दिया जाता है। श्रद्धा अब साधना नहीं, बल्कि समर्थन का प्रमाण बन जाती है।
पिछड़ों और सवर्णों के बीच आरक्षण की राजनीति सामाजिक न्याय के मूल उद्देश्य से भटकती हुई दिखाई देती है। 87/13 जैसे आंकड़े भावनात्मक रूप से उछाले जाते हैं, लेकिन यह सवाल नहीं पूछा जाता कि क्या शिक्षा और रोज़गार के अवसर वास्तव में बढ़े हैं? क्या सरकारी नौकरियों की संख्या में वृद्धि हुई है? या हम केवल सीमित संसाधनों के बँटवारे को लेकर आपस में लड़ रहे हैं?
इसी तरह दलित समाज के भीतर क्रीमी लेयर की बहस। यह बहस नीति सुधार के नाम पर शुरू होती है, लेकिन जल्द ही समुदाय के भीतर ही विभाजन पैदा कर देती है। व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय, दोष एक ही वर्ग के दूसरे हिस्से पर मढ़ दिया जाता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति छात्रों और युवाओं की है। UGC, नई शिक्षा नीति, फीस, परीक्षाएँ और डिग्रियाँ — हर मुद्दे पर छात्र आपस में बँटे हुए हैं। कोई डिग्री को लेकर लड़ रहा है, कोई स्किल को लेकर। लेकिन बेरोज़गारी, जो ऐतिहासिक स्तर पर है, उस पर एकजुट आंदोलन दिखाई नहीं देता। युवा ऊर्जा सवाल पूछने के बजाय बहसों में खप जाती है।
इन सभी उदाहरणों का निष्कर्ष एक ही है —
जब समाज आपस में लड़ता है, तब सत्ता से सवाल नहीं करता।
यही कारण है कि आज जनता साफ़ पानी, अच्छी सड़कें, सस्ती शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षा और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दों पर कम और पहचान आधारित मुद्दों पर ज़्यादा बहस करती दिखाई देती है। महंगाई धीरे-धीरे सामान्य मान ली जाती है। टैक्स बढ़ता है, लेकिन सुविधाएँ नहीं। रुपया गिरता है, लेकिन राष्ट्रवाद के शोर में वह गिरावट अदृश्य हो जाती है।
इतिहास यह भी बताता है कि सत्ता में आने वाली लगभग हर पार्टी अंततः उसी रास्ते पर चल पड़ती है, जिसे वह कभी गलत बताती थी। इसे ही जनता व्यंग्य में “कांग्रेसिकरण” कहती है — यानी सत्ता का केंद्रीकरण, संस्थाओं पर नियंत्रण, आलोचना से असहिष्णुता और भावनात्मक राजनीति।
यही कारण है कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आवश्यकता है।
यह किसी एक नेता या पार्टी के विरोध का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह याद दिलाने का माध्यम है कि सत्ता जनता की जागीर नहीं, बल्कि जनता की सेवा का दायित्व है।
प्रतीकों की राजनीति भी इसी व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है।
एक ओर “56 इंच का सीना” जैसे जुमले — जो ताकत का आभास देते हैं।
दूसरी ओर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का दबाव — जहाँ डॉलर 92 रुपये के पार पहुँचता है और आम आदमी की जेब हल्की होती जाती है।
सवाल यह नहीं है कि नेता कितना मजबूत दिखाई देता है, सवाल यह है कि देश की संस्थाएँ कितनी मजबूत हैं।
सवाल यह नहीं है कि भाषण कितने प्रभावशाली हैं, सवाल यह है कि नीतियाँ कितनी असरदार हैं।
एक परिपक्व लोकतंत्र वही होता है जहाँ जनता भावनाओं से नहीं, तथ्यों से निर्णय ले। जहाँ नागरिक यह समझे कि उसकी असली लड़ाई किसी दूसरे नागरिक से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जो उसे बुनियादी अधिकारों से वंचित रखती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज अपने मतभेदों को स्वीकार करते हुए भी साझा सवाल पूछे —
रोज़गार कहाँ है?
शिक्षा इतनी महंगी क्यों है?
स्वास्थ्य व्यवस्था आम आदमी की पहुँच से बाहर क्यों है?
भ्रष्टाचार के बड़े मामलों में जवाबदेही क्यों नहीं दिखती?
जब तक ये सवाल जीवित हैं, लोकतंत्र जीवित है।
और जिस दिन समाज केवल पहचान की राजनीति में उलझ गया, उस दिन सत्ता चाहे किसी की भी हो — जनता हार जाएगी।
संपादकीय का उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि चेतावनी देना है।
लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता, वह सतत सवालों, आलोचना और जागरूकता से चलता है।
सत्ता बदलती रहनी चाहिए,
लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है —
सत्ता से सवाल पूछते रहना।
✍️ लेखक : दुर्गेश यादव सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक!
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