गुरुवार, 3 सितंबर 2026
विश्वगुरु' इकॉनोमी या खोखला दावा? जानिए भारत की K-Shaped रिकवरी का पूरा सच
आंकड़ों का जश्न और ज़मीन का सन्नाटा: क्या यही हमारी अर्थव्यवस्था का सच है?
मुख्यधारा के मीडिया के लिए अर्थव्यवस्था का मतलब कुछ चमकदार तस्वीरों में सिमट कर रह गया है—कार शोरूम के बाहर लगी कतारें, वीकेंड पर गुलज़ार रहने वाले फाइव-स्टार रेस्तरां, रिकॉर्ड तोड़ता GST कलेक्शन और एयरपोर्ट पर यात्रियों की गहमागहमी। प्रेस विज्ञप्तियों और सरकारी बुलेटिनों में जीडीपी के ये आंकड़े किसी भव्य उत्सव की तरह गाए जाते हैं। लेकिन एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में, जब आप चमचमाते नेशनल हाईवे से उतरकर देश के दूर-दराज के इलाकों या किसी मिडिल-क्लास मोहल्ले की तंग गलियों में दाखिल होते हैं, तो यह उत्सव अचानक किसी गंतव्यहीन बहस में बदल जाता है।
इसे आसान भाषा में समझना हो तो किसी जटिल आर्थिक शब्दावली की ज़रूरत नहीं है; बस दो अलग-अलग इंडिया की तस्वीरों को आमने-सामने रख दीजिए।
एक तरफ वह भारत है जो 50 लाख की SUV खरीद रहा है, क्रेडिट कार्ड स्वाइप करके छुट्टियों पर विदेश जा रहा है और महंगी कॉफ़ी की चुस्की लेते हुए देश के 'विश्वगुरु' बनने के कसीदे पढ़ रहा है। दूसरी तरफ वह भारत है जो हर महीने किराने वाले की 'उधार की डायरी' में अपने वजूद को सिकुड़ते देख रहा है, जहाँ सब्ज़ी की रेहड़ी पर किलो भर टमाटर या किलो भर लहसुन की जगह अब ग्राम में तौलने की नौबत है।
अर्थशास्त्र की भाषा में इसे 'K-Shaped Recovery' कहा जाता है। यानी विकास की एक रेखा ऊपर की ओर जा रही है (अमीरों और उच्च-मध्यम वर्ग के लिए), जबकि दूसरी रेखा तेज़ी से नीचे की ओर ढलान भर रही है (असंगठित क्षेत्र, गरीब और निचले मध्यम वर्ग के लिए)। जब शीर्ष का 5 या 10 प्रतिशत तबका बेतहाशा खर्च करता है, तो कुल आंकड़ा (Average Data) देखने में बहुत सुखद लगता है। लेकिन यह औसत का वही धोखा है, जिसमें नदी की औसत गहराई चार फीट जानकर छलांग लगाने वाला व्यक्ति गहरे पानी में डूब जाता है।
विरोधाभास के कुछ कड़वे सवाल हमारे सामने खड़े हैं:
अगर खपत इतनी ही मजबूत है, तो 80 करोड़ से ज़्यादा आबादी को मुफ़्त राशन के सहारे की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? किसी भी विकासशील देश में मुफ़्त अनाज का विस्तार कल्याणकारी राज्य की सफलता हो सकता है, लेकिन यह इस बात का स्वीकार्य सबूत भी है कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी अपने बलबूते पेट भरने की आर्थिक क्षमता नहीं रखती।
अगर बैंकों का क्रेडिट ग्रोथ इतना शानदार है, तो उसमें असुरक्षित (Unsecured) पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड डिफ़ॉल्ट का हिस्सा क्यों बढ़ रहा है? लोग अपनी आय बढ़ाने के लिए संपत्ति नहीं बना रहे, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों, बीमारियों के इलाज और बच्चों की बढ़ती फ़ीस को भरने के लिए क़र्ज़ के चक्रव्यूह में उलझ रहे हैं।
रोज़गार की वास्तविक स्थिति क्या है? चपरासी या सफाईकर्मी के कुछ सौ पदों के लिए जब लाखों ग्रेजुएट, पोस्ट-ग्रेजुएट और पीएचडी धारक कतार में खड़े होते हैं, तो यह सिर्फ़ बेरोज़गारी का आंकड़ा नहीं है—यह युवाओं की उम्मीदों और योग्यता के अवमूल्यन की त्रासद कहानी है।
GST का 2 लाख करोड़ रुपये छूना कारोबार की रफ्तार तो दिखाता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अप्रत्यक्ष करों (Indirect Taxes) का सबसे बड़ा बोझ उसी आम जनता की जेब पर पड़ता है, जिसकी आय पिछले कुछ वर्षों में या तो स्थिर रही है या महंगाई की दर से पिछड़ गई है। आटा, दाल, छाछ और स्टेशनरी जैसी बुनियादी चीजों पर टैक्स वसूलकर जुटाया गया राजस्व जन-कल्याण का पैमाना नहीं हो सकता।
एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था वह नहीं होती जहाँ मुट्ठी भर लोग भव्यता का प्रदर्शन करें और बाकी आबादी केवल उसके दर्शक या टैक्स-पेयर बनकर रह जाए। अर्थव्यवस्था का असली टेस्ट किसी बैंक मैनेजर के दावों या एयरपोर्ट के फुटफॉल से नहीं होता; इसका असली टेस्ट उस आम भारतीय की रसोई में होता है, जो महीने के आखिरी हफ्ते में अपनी जेब टटोलते हुए यह तय करता है कि इस बार दूध की थैली आधी करनी है या दवाई टालनी है।
समय आ गया है कि हम आंकड़ों की बाजीगरी से बाहर निकलकर ज़मीन के इस सन्नाटे को सुनें। क्योंकि जब तक विकास की रोशनी समाज की आखिरी कतार तक नहीं पहुँचेगी, तब तक हर चमकदार आंकड़ा महज़ एक खुशनुमा भ्रम ही रहेगा।
दुर्गेश कुमार यादव!
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