मंगलवार, 26 अगस्त 2025

टैरिफ़ संकट : उप्र के निर्यातक तबाही के मुहाने पर कारीगरों और उद्योगों पर मंडराता ख़तरा

📰संपादकीय विशेष उत्तर प्रदेश न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी कला, शिल्प और उद्योगों की विशिष्ट पहचान रखता है। बनारस की साड़ी, मुरादाबाद का पीतल, अलीगढ़ के ताले, भदोही का कालीन, कन्नौज का इत्र, सहारनपुर का लकड़ी का काम, लखनऊ की चिकनकारी, वाराणसी की ज़री-जरदोज़ी और गोरखपुर का टेराकोटा—ये सब मिलकर न सिर्फ प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका का साधन भी। लेकिन आज वही उद्योग-समुदाय टैरिफ़ संकट की मार से कराह रहा है। विदेशी बाज़ारों में लगाई गई प्रतिशोधात्मक टैरिफ़ और केंद्र सरकार की नीतिगत असफलताओं ने उत्तर प्रदेश के निर्यातकों को कठिन मोड़ पर खड़ा कर दिया है। जहाज़ों में माल फँसा हुआ है, भुगतान चक्र ठप हो गया है, और सप्लायर्स से लेकर ट्रांसपोर्ट सेक्टर तक हर कोई नुकसान झेल रहा है। संकट की जड़ : गलत नीतियाँ विदेशी बाज़ारों में प्रतिशोधात्मक टैरिफ़ कूटनीतिक स्तर पर समाधान की विफलता छोटे कुटीर और लघु उद्योगों पर सबसे ज्यादा असर निर्यातकों का कहना है कि मौजूदा संकट अचानक नहीं आया। यह सरकार की नीतिगत कमियों का परिणाम है। जब विदेशी देशों ने भारत के उत्पादों पर टैरिफ़ थोपे, तो कूटनीतिक स्तर पर पहल होनी चाहिए थी। लेकिन सरकार ने समय रहते वैकल्पिक समाधान नहीं खोजा। अरबों-खरबों का माल विदेशी जहाज़ों और बंदरगाहों में अटका 🔹 पेमेंट चक्र ठप, निर्यातकों पर पूँजी संकट 🔹 ODOP योजना नाकाम, राहत के नाम पर केवल प्रचार 🔹 कारीगर और शिल्पकार सबसे बड़े शिकार 🔹 प्रदेश में बेरोज़गारी और विकराल होने का खतरा ODOP योजना पर सवाल उत्तर प्रदेश सरकार की ODOP (वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट) योजना को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे। कहा गया था कि यह प्रदेश के पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाएगी। लेकिन जब संकट आया, तो यह योजना कहीं दिखाई नहीं दी। सवाल यह उठता है कि क्या ODOP केवल प्रदर्शनी और पोस्टरबाज़ी तक ही सीमित थी? कारीगरों की दोहरी मार यह संकट सिर्फ़ निर्यातकों तक सीमित नहीं। असली मार उन कारीगरों और मजदूरों पर पड़ रही है, जो महीनों तक मेहनत करके उत्पाद तैयार करते हैं। बनारसी साड़ी बुनने वाला बुनकर कन्नौज का इत्र बनाने वाला कारीगर सहारनपुर का लकड़ी तराशने वाला शिल्पकार गोरखपुर का टेराकोटा कलाकार इनकी मेहनत का माल बिके बिना गोदामों में पड़ा है। पैसे न मिलने से रोज़मर्रा का खर्च तक चलाना मुश्किल हो रहा है। समाधान की दिशा इस संकट से बाहर निकलने के लिए सरकार के पास ठोस विकल्प हैं : 1. विशेष राहत पैकेज – पूँजी संकट से जूझ रहे निर्यातकों के लिए। 2. टैक्स और शुल्क में छूट – ODOP और अन्य उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए। 3. कूटनीतिक पहल – विदेशी देशों के साथ वार्ता कर टैरिफ़ संकट का समाधान। 4. कारीगर सहायता योजना – मजदूरों को सीधे नकद और रोज़गार गारंटी। 5. लॉजिस्टिक्स सपोर्ट – बंदरगाहों और शिपमेंट में फँसे माल को छुड़ाने की विशेष व्यवस्था। सवाल सरकार से क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल चुनावी भाषणों और विज्ञापन तक सीमित रह गई है? क्या यह वही समय नहीं जब उसे अपने उद्योगपतियों, कारीगरों और निर्यातकों के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए था? दरअसल, कमी कोष की नहीं, सोच की है। निष्कर्ष यह संकट केवल व्यापार या निर्यात का नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका और करोड़ों लोगों के भविष्य का सवाल है। अगर सरकार ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए तो उप्र का निर्यात उद्योग चौपट हो जाएगा और बेरोज़गारी का सैलाब और विकराल रूप ले लेगा। आज आवश्यकता है कि समाज, उद्योग और निर्यातक एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद करें और सरकार को मजबूर करें कि वह इस "टेरिफ़ाइंग टैरिफ़ इमर्जेंसी" में अपने लोगों के साथ खड़ी हो। ✍️ लेखक : दुर्गेश यादव.!

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

नरेंद्र मोदी का ढलता सूरज और राहुल गांधी का उगता हुआ नेतृत्व

दुर्गेश यादव - देश की राजनीति इस समय संक्रमण काल से गुजर रही है। नरमोदी के नायकत्व का दौर धीरे-धीरे ढलान की ओर है और इसके समानांतर राहुल गांधी एक नए राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर रहे हैं। यह सिर्फ भारतीय परिदृश्य तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक राजनीति का नया पैटर्न है, जहां बड़े बदलाव किसी विचारधारा से अधिक किसी ‘नायक’ या ‘व्यक्ति’ के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई दे रहे हैं। पिछले दो दशकों में हमने देखा कि चाहे अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप हों, फ्रांस में मैक्रों, ब्राजील में बोलसोनारो और अब लूला, इटली में मेलोनी, रूस में पुतिन या चीन में शी जिनपिंग—सत्ता और जनाकर्षण का केंद्र व्यक्ति विशेष ही बनता गया है। जनता को नायक चाहिए, जो उनकी समस्याओं का सीधा समाधान करने का दावा करे। भारत में 2014 में यह भूमिका नरेंद्र मोदी ने निभाई। उन्होंने खुद को ऐसा नेता प्रस्तुत किया जिसके पास हर समस्या का समाधान है। गुजरात मॉडल, भ्रष्टाचार मुक्त शासन और विकास के बड़े सपनों ने उन्हें जनता का ‘नायक’ बना दिया। लेकिन समय के साथ वह जादू टूटने लगा। मोदी सरकार ने दो बड़े वादे पूरे किए—राम मंदिर निर्माण और धारा 370 का खात्मा। परंतु देश का बड़ा तबका सिर्फ इन्हीं मुद्दों पर खड़ा नहीं था। उसे रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और आर्थिक सुरक्षा का समाधान चाहिए था। 11 सालों के बाद यह निराशा गहरी हो चुकी है। जनता समझ चुकी है कि जादू की छड़ी जैसी कोई चीज नहीं होती। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का उदाहरण भी इसी पैटर्न को दिखाता है। पहले उन्होंने भ्रष्टाचार-मुक्त राजनीति और जनहित की राजनीति का वादा किया, जनता ने भरोसा किया, लेकिन समय के साथ वह भी अपनी आभा खो बैठे। यही स्थिति नरेंद्र मोदी की भी होती जा रही है। आज मोदी का समर्थन आधार मुख्य रूप से वही 20-25% वोटर हैं जो दक्षिणपंथी विचारधारा और जातिगत-सांस्कृतिक वर्चस्व से प्रेरित हैं। लेकिन बाकी मतदाता—विशेषकर वे 15-20% जिन्होंने नई उम्मीद के साथ मोदी को चुना था—अब उनसे उम्मीद छोड़ चुके हैं। यही शून्य राहुल गांधी भर रहे हैं। राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों में बिल्कुल नए तेवर में सामने आए हैं। संविधान की रक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, जाति-जनगणना, आरक्षण और समानता जैसे मुद्दों को उन्होंने केंद्र में रखा है। उनकी भारत जोड़ो यात्रा और हालिया ‘वोट चोरी विरोधी अभियान’ ने उन्हें आम लोगों से जोड़ने का काम किया है। संसद में उनका सीधा तेवर और जोखिम उठाने की क्षमता उन्हें मोदी का वास्तविक प्रतिद्वंद्वी बनाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि राहुल गांधी अकेले नहीं हैं। उनके साथ अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, एम.के. स्टालिन, ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे जैसे क्षेत्रीय नेता भी खड़े हैं, जो अपने-अपने राज्यों में मजबूत आधार रखते हैं। यह गठजोड़ न सिर्फ मोदी विरोध की राजनीति को धार दे रहा है, बल्कि एक व्यापक वैकल्पिक चेहरा भी गढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर भी नरेंद्र मोदी की छवि कमजोर हुई है। कभी विश्वगुरु और वैश्विक नेता के रूप में प्रचारित मोदी आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाशिए पर खड़े दिखाई देते हैं। यही कारण है कि भारतीय राजनीति में अब राहुल गांधी का नेतृत्व एक गंभीर संभावना बनकर उभर रहा है। बेशक, सत्ता में आने के बाद राहुल गांधी और उनका गठबंधन कितना सफल होगा, यह भविष्य बताएगा। यदि वे भी जनता की बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए, तो यह खोज किसी और नायक की ओर मुड़ जाएगी। लेकिन फिलहाल तस्वीर साफ है—देश एक नए सूरज के उदय का साक्षी बन रहा है। आज की राजनीतिक फ़िज़ा यही कह रही है कि नरेंद्र मोदी रूपी सूरज ढल रहा है और राहुल गांधी का नेतृत्व नई आशा के साथ चमक रहा है।

बुधवार, 20 अगस्त 2025

किराएदारों की खामोश पीड़ा—एक अदृश्य शोषण

देश की गलियों और चौकों में आए दिन छोटी-छोटी घटनाओं पर धरना-प्रदर्शन, नारेबाज़ी और आंदोलन देखने को मिलते हैं। सरकारें नए-नए वादे करती हैं, विकास के दावे पेश किए जाते हैं। लेकिन इन्हीं नारों और वादों के शोर में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो सबसे अधिक पीड़ित है, परंतु खामोश है। शायद उसने मान लिया है कि उसकी आवाज़ कभी संसद के गलियारों तक नहीं पहुँचेगी। यह वर्ग है—किराएदारों का, जिनमें हर मज़दूर, हर प्रवासी, हर छात्र शामिल है, जो घर से दूर काम या पढ़ाई की तलाश में निकलता है। शहरों और कस्बों में किराए पर रहने वाले लोगों की ज़िंदगी आसान नहीं है। एक ओर रोज़गार और पढ़ाई का दबाव, दूसरी ओर मकान मालिकों और पीजी संचालकों का मनमाना रवैया। कमरे छोटे से छोटे होते जा रहे हैं, लेकिन किराया लगातार बढ़ रहा है। किराए की कोई सीमा तय नहीं है—मालिक का मन ही नियम है। नतीजा यह कि मज़दूर अपनी आधी से ज़्यादा कमाई, और छात्र अपनी अधिकांश पारिवारिक मदद सिर्फ किराए में खर्च कर देता है। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि किराएदार के पास अपनी कमाई का हिसाब तक नहीं बचता। एक रिपोर्ट के अनुसार, महानगरों में रहने वाले एक सामान्य कर्मचारी की आय का लगभग 40% हिस्सा किराए में चला जाता है। मज़दूर वर्ग और भी अधिक पीड़ा झेलता है, जहाँ अक्सर आधी आय सिर पर छत के नाम पर खर्च हो जाती है। समस्या केवल किराए की अधिकता तक सीमित नहीं है। मकान मालिक और पीजी संचालक बिजली-पानी पर मनमाने नियम थोपते हैं। "इतनी ही बिजली जलेगी," "इतने बजे तक पानी चलेगा," "मेहमान नहीं आ सकते"—ये शर्तें आम हो चुकी हैं। किराएदार अपने ही पैसे से घर लेता है, पर उसका इस्तेमाल करने का अधिकार तक सीमित कर दिया जाता है। यह स्थिति कहीं न कहीं आधुनिक युग की गुलामी जैसी प्रतीत होती है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि किराए का अधिकांश लेन-देन नकद में होता है। न कोई रसीद, न कोई प्रमाण। यदि किराएदार ऑनलाइन भुगतान की माँग करे, तो जवाब मिलता है—"नहीं चाहिए तो कमरा खाली कर दो।"यह दबाव और असुरक्षा हर महीने किराएदार की ज़िंदगी में एक नए डर का संचार करती है। इससे न केवल किराएदार का शोषण होता है, बल्कि देश को भी टैक्स चोरी के रूप में नुकसान उठाना पड़ता है। हमारे देश के किराया कानून भी इस अन्याय से लड़ने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। 1948 का किराया नियंत्रण अधिनियम आज की परिस्थितियों के हिसाब से बिल्कुल अप्रासंगिक हो चुका है। राज्यों ने अपने-अपने कानून तो बनाए, लेकिन उनका पालन मुश्किल से होता है। परिणाम यह है कि किराएदार आज भी पूरी तरह असुरक्षित है। आख़िरकार सवाल यह है कि सरकारें इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं? जब किसान, छात्र या व्यापारी सड़कों पर उतरते हैं, तो तुरंत राजनीतिक हलचल शुरू हो जाती है। मगर किराएदारों का वर्ग इतना बड़ा होने के बावजूद खामोश क्यों है? शायद इसलिए कि यह वर्ग बिखरा हुआ है, संगठित नहीं है। और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है। अब समय है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है— 1. हर शहर में किराया नियंत्रण बोर्ड बने, जहाँ किराएदार अपनी शिकायत दर्ज करा सके। 2. हर किराए का भुगतान ऑनलाइन और पंजीकृत किया जाए। 3. किराए में बढ़ोतरी की एक वार्षिक सीमा तय हो। 4. मजदूरों, कर्मचारियों और छात्रों के लिए सस्ते व सम्मानजनक आवास योजनाएँ शुरू की जाएँ। 5. किरायेदारों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय नीति बनाई जाए। भारत यदि वास्तव में “विश्वगुरु” बनने का सपना देख रहा है, तो उसे सबसे पहले अपने नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना होगा। सिर पर छत केवल एक भौतिक सुविधा नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक है। जब देश का मज़दूर, प्रवासी और छात्र ही अपने अधिकारों से वंचित रहेगा, तो विकास के सारे दावे अधूरे रहेंगे। किराएदारों का दर्द खामोश है, लेकिन अनदेखा नहीं किया जा सकता। अब वक्त है कि इस खामोश वर्ग की आवाज़ संसद के गलियारों तक पहुँचे और उन्हें उनका हक़ मिले। ✍️दुर्गेश यादव! संपादकीय लेख कैसा लगा अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं! धन्यवाद!

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

आयोग पर वोटों की चोरी का सीधा आरोप लगाया है पर वोटों की चोरी का सीधा आरोप लगाया है, तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है?

🗳️“अगर जनता का वोट सुरक्षित नहीं, तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है?” यह सवाल आज हर भारतीय के दिल में उठ रहा है, और इसकी वजह है कांग्रेस नेता राहुल गांधी का वह बयान, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग पर वोटों की चोरी का सीधा आरोप लगाया है। लोकतंत्र पर चोट? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ हर वोट की अहमियत है। लेकिन जब चुनाव के बाद यह सुनने को मिले कि वोटों की चोरी हुई, कि ईवीएम से छेड़छाड़ की गई, या कि नतीजों को बदल दिया गया, तो सिर्फ एक नेता नहीं, हर नागरिक का दिल दुखता हैराहुल गांधी ने हाल ही में दावा किया कि उनके पास ऐसे ठोस सबूत हैं जो यह साबित करते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कई सीटों पर वोटिंग प्रक्रिया में गड़बड़ियां हुईं। क्या हैं राहुल गांधी के आरोप? राहुल गांधी ने कहा: “देश की आत्मा को खत्म किया जा रहा है। हम चुप नहीं बैठेंगे। हमने सबूत इकट्ठा किए हैं — फर्जी वोटिंग, ईवीएम में गड़बड़ी और मतगणना में धांधली। यह लोकतंत्र की हत्या है।” उन्होंने कुछ वीडियो और दस्तावेज सार्वजनिक किए, जिनमें दिखाया गया कि कुछ पोलिंग बूथ्स पर एक ही व्यक्ति कई बार वोट डाल रहा है, और EVM और VVPAT मिलान में अंतर पाया गया। चुनाव आयोग की चुप्पी पर सवाल जब देश की जनता सवाल पूछ रही हो, और विपक्षी नेता खुलेआम चुनाव आयोग पर सवाल खड़े कर रहे हों — ऐसे में आयोग की चुप्पी और भी ज़्यादा संदेह पैदा करती है। अगर चुनाव निष्पक्ष हुए हैं, तो पारदर्शिता दिखाना क्या मुश्किल है? विपक्ष का समर्थन राहुल गांधी के खुलासे के बाद पूरे विपक्ष ने इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाई है। INDIA गठबंधन के सभी प्रमुख नेता इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि एक न्यायिक जांच हो और भविष्य में बैलेट पेपर की वापसी की मांग भी उठ रही है। जनता का दर्द देश के लाखों लोग सोशल मीडिया पर #VotekiChori और #EVMBan करो जैसे हैशटैग चला रहे हैं। हर आम नागरिक यही पूछ रहा है — "अगर मेरा वोट सुरक्षित नहीं है, तो मेरी आवाज़ किसे सुनाई देगी? निष्कर्ष: ये सिर्फ राहुल गांधी की लड़ाई नहीं है, ये हमारी है। चुनाव कोई खेल नहीं है। यह एक नागरिक की सबसे बड़ी ताकत है। अगर इस पर सवाल उठ रहे हैं, तो हम सबकी जिम्मेदारी है कि जवाब माँगें। राहुल गांधी ने जो कदम उठाया है, वह भले ही राजनीतिक हो — लेकिन इसका असर हर आम इंसान के भविष्य पर पड़ेगा। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर वोटों की चोरी का बड़ा आरोप लगाया है। जानिए क्या हैं उनके सबूत, जनता की प्रतिक्रिया और क्या वाकई भारत का लोकतंत्र खतरे में है? #राहुलगांधी #चुनावआयोग #वोटकीचोरी #EVMगड़बड़ी #लोकसभा2024 #भारतमेंचुनाव #भारतीयलोकतंत्र #ElectionFraudIndia #VoteChoriExpose #RahulGandhiNews #ElectionCommissionIndia

रविवार, 20 जुलाई 2025

कैमरे संविधान नहीं, जाति चुनते है.!

कैमरे संविधान नहीं, जाति चुनते है.! हम एक लोकतंत्र में जी रहे हैं। एक ऐसा लोकतंत्र, जहां हर नागरिक को समान अवसर, समान सम्मान और समान अभिव्यक्ति का अधिकार है। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा हो रहा है? कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ़ एक सजावटी फ्रेम टंगा है — जिसमें सत्ता का चेहरा बार-बार बदलता है, लेकिन उसका चरित्र वही रहता है। आज हम एक अजीब दृश्य देख रहे हैं। एक व्यक्ति, जिसका न कोई विधायक है, न सांसद, न कोई जन आंदोलन और न ही जनाधार — फिर भी देश की सबसे बड़ी मीडिया संस्थाएं उसके पीछे भाग रही हैं। वो व्यक्ति है — प्रशांत किशोर पांडे, और उसकी पार्टी — जनसुराज। मीडिया का झुकाव — इत्तेफ़ाक़ नहीं, एजेंडा है जनसुराज पार्टी की जमीनी हकीकत क्या है, यह बिहार का हर गांव जानता है। लेकिन मीडिया की सुर्खियाँ, टीवी की प्राइम टाइम बहसें, अख़बारों के पहले पन्ने — सब इस एक व्यक्ति को इतनी तवज्जो क्यों देते हैं? क्या ये मुफ्त की मोहब्बत है? नहीं। ये उस सत्ता संरचना का हिस्सा है, जिसे ‘इकोसिस्टम’ कहा जाता है। एक ऐसा इकोसिस्टम, जो अपने जातीय और सामाजिक हितों की रक्षा के लिए किसी को भी नेता बना सकता है — और किसी को भी ‘नौवीं फेल’ कहकर खारिज कर सकता है। “नौवीं फेल” — एक शब्द नहीं, जातीय घृणा का प्रतीक तेजस्वी यादव पर लगातार “नौवीं फेल” कहकर हमला किया जाता है। ये हमला सिर्फ़ उनकी पढ़ाई पर नहीं है — ये हमला है उनके होने पर। उनके ओबीसी होने पर। उनके गरीब-पिछड़े पृष्ठभूमि से आने पर। उनके उस संघर्ष पर, जो हर उस नौजवान का प्रतिनिधित्व करता है जो पहली बार अपने गांव, अपने समाज, अपनी जाति से निकलकर सत्ता के गलियारे तक पहुंचा है। क्या शिक्षा सिर्फ तेजस्वी के लिए मापदंड है? कभी किसी ने उनसे ये नहीं पूछा जिनके पास डिग्री तो है, पर न ज्ञान है, न संवेदनशीलता। कभी किसी ने उन सांसदों पर सवाल नहीं उठाए जिनकी डिग्रियाँ झूठी पाई गईं, या जो जातीय गठबंधन और पैसों के दम पर संसद पहुँचे। तो फिर तेजस्वी क्यों? क्योंकि वो “पिछड़े” हैं — और “नेता” बनने लगे हैं भारत की राजनीति में जब कोई दलित या पिछड़ा नौजवान सत्ता के करीब आने लगता है, तो एक पूरा ‘इकोसिस्टम’ सक्रिय हो जाता है — उसकी योग्यता पर शक किया जाता है, उसकी भाषा का मज़ाक उड़ाया जाता है, और उसकी जाति को उसकी सबसे बड़ी ‘कमज़ोरी’ बना दिया जाता है। प्रशांत किशोर इस इकोसिस्टम के चेहरे हैं। वे खुद को विकास का मसीहा बताते हैं, लेकिन उनका असल उद्देश्य सत्ता की ‘सामाजिक बनावट’ को जस का तस बनाए रखना है — जिसमें नेतृत्व का अधिकार कुछ ख़ास जातियों तक सीमित रहे। तेजस्वी की आलोचना — ज़रूरी है, लेकिन ईमानदार हो तेजस्वी यादव पर सवाल ज़रूर उठाइए — उनकी सरकार क्या कर रही है, क्या नहीं कर पा रही है — इस पर खुलकर बहस होनी चाहिए। लेकिन बहस उस बात पर होनी चाहिए जो नीतिगत हो, *विकास* से जुड़ी हो — ना कि उस बात पर जो उनकी जाति, पढ़ाई या भाषा को निशाना बनाए। राजनीतिक आलोचना, अगर जातीय अपमान में बदल जाए, तो वो लोकतंत्र का नहीं, वर्णव्यवस्था का विस्तार बन जाती है। ये लड़ाई तेजस्वी बनाम किशोर की नहीं है ये लड़ाई प्रतिनिधित्व बनाम प्रभुत्व की है। ये लड़ाई है कि क्या भारत में कोई पिछड़ा, गरीब, ओबीसी, दलित — नेतृत्व की ऊंचाई तक पहुंच सकता है या नहीं। क्या संविधान का सपना — जिसमें सबको बराबरी का अधिकार है — हकीकत बन पाएगा या हम फिर से ‘मनु की व्यवस्था’ की तरफ लौट जाएंगे? निष्कर्ष: कैमरे, जो कभी जनता की आंखें थे — अब सत्ता के एजेंडे के औज़ार बनते जा रहे हैं। और आज जब कैमरा किसी विधायक, सांसद या जननेता की तरफ़ नहीं, बल्कि एक “सवर्ण सलाहकार” की तरफ़ बार-बार मुड़ता है, तो समझ जाइए — ये सिर्फ़ एक मीडिया ट्रेंड नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक-सामाजिक साजिश है। अब सवाल जनता से है — आप कैमरे की दिशा में चलेंगे, या हकीकत की तरफ़ देखेंगे? लेखक: स्वतंत्र विचारक श्रेणी: सामाजिक न्याय | लोकतांत्रिक विमर्श | राजनीतिक विश्लेषण

शनिवार, 12 जुलाई 2025

📚“शिक्षा की चुप्पी – जब स्कूल खामोश हो जाते हैं.

📚“शिक्षा की चुप्पी – जब स्कूल खामोश हो जाते हैं..." ✍️ 'By Durgesh Yadav' "जब समाज मंदिर-मस्जिद में उलझा हो, और स्कूलों पर ताले लगे हों, तो कोई क्रांति नहीं आती — सिर्फ अंधेरा फैलता है।" आज हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ देश तकनीक, अंतरिक्ष और वैश्विक नेतृत्व की बातें कर रहा है। लेकिन ज़रा पीछे मुड़िए... गाँव की ओर देखिए... जहाँ स्कूल हैं — पर बच्चे नहीं। जहाँ शिक्षक हैं — पर पढ़ाई नहीं। जहाँ बिल्डिंग है — पर माहौल नहीं। 🔍सवाल यह नहीं कि स्कूल हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या वहाँ ‘शिक्षा’ है? हर चौराहे पर शराब की दुकान सजती है, युवा धर्म के नारों में उलझे हैं, और स्कूल...? वो या तो बंद पड़े हैं, या नाम मात्र के लिए चल रहे हैं। 📉क्या वजह है कि आज गरीब माता-पिता भी महंगे प्राइवेट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं? ₹1500–12000 तक की मनमानी फीस, किताबें, ड्रेस, ट्रांसपोर्ट का बोझ, फिर भी वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं भेजना चाहते। क्यों? क्योंकि उन्हें स्कूल की इमारत नहीं, शिक्षा की गुणवत्ता चाहिए। और यही गुणवत्ता उन्हें सरकारी स्कूल में नहीं मिल रही। 🎯 सबूत हमारे ही सिस्टम में छिपा है: 👉 नवोदय विद्यालय 👉 केंद्रीय विद्यालय ये भी तो सरकारी स्कूल हैं। फिर क्यों यहाँ बच्चे टूटकर प्रवेश चाहते हैं? क्योंकि वहाँ: बेहतर शिक्षक हैं, बेहतर संसाधन हैं, और सबसे महत्वपूर्ण — नियत और निगरानी है। 🧩तो क्या बाकी सरकारी स्कूलों का सुधरना असंभव है? बिलकुल नहीं। समस्या यह नहीं कि पैसा नहीं है, समस्या है — प्राथमिकता नहीं है। सरकारें शिक्षा को "योजना" की तरह देखती हैं, जबकि यह तो राष्ट्र निर्माण की नींव है। 📌 गांवों के स्कूलों की उदासीनता का कारण एक ही है — वहां पढ़ने वाले बच्चे ‘सिस्टम’ के नहीं हैं। * न वो किसी बड़े अफसर के बच्चे हैं, * न किसी मंत्री के, * और न किसी अमीर के। वे गरीब हैं। उनके पास विकल्प नहीं है — इसलिए उनकी आवाज़ भी नहीं है। ✅ समाधान की ओर पहला कदम – सामूहिक चेतना और भागीदारी: 1.हर गाँव में शिक्षा निगरानी समिति बने – जो मासिक रिपोर्टिंग करे। 2. शिक्षकों की उपस्थिति और गुणवत्ता का स्वतंत्र ऑडिट हो। 3.जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाया जाए — हर ब्लॉक में शिक्षा रिपोर्ट कार्ड बने। 4.पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी से संसाधन जोड़े जाएं। 🔔 अब भी वक़्त है... > हम अगर अब भी नहीं चेते, > तो अगली पीढ़ी केवल मजदूर, ड्राइवर और नौकर बनकर रह जाएगी, > और हम सोचते रह जाएंगे कि "हमने तो स्कूल खुलवाया था…" शिक्षा का सवाल अब केवल नीति का नहीं, न्याय का है। 🙏 आइए, एकजुट होकर सवाल पूछें, आवाज़ उठाएं और परिवर्तन की शुरुआत करें। क्योंकि… 📝 “जब आखिरी स्कूल बंद हो जाएगा, तब हमें एहसास होगा कि मंदिर और मस्जिद की बहसें हमें कहीं नहीं ले गईं।” \#शिक्षा\_का\_अधिकार #RuralEducation #SchoolReform #LinkedInForChange #BharatKaBhavishya #VoiceForChildren #DurgeshKumarYadav #RuralReformBrigade #Navodaya #KendriyaVidyalaya #GovernmentSchools #EducationMatters

रविवार, 6 जुलाई 2025

शिक्षा का दीपक क्यों बुझ रहा है?" – एक सोचने योग्य सवाल.?

िक्षा का दीपक क्यों बुझ रहा है?" – एक सोचने योग्य सवाल आज हमारा देश एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। आज़बाद एक सपना देखा गया था – हर घर में शिक्षा का दीपक जले, हर बच्चा स्कूल जाए, और एक सशक्त, शिक्षित भारत का निर्माण हो। लेकिन आज हालात कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। सरकार की तरफ से गांवों के सरकारी स्कूलों को “मर्ज़” (विलय) के नाम पर बंद किया जा रहा है। कारण बताया जाता है कि स्कूलों में 20 से कम बच्चे हैं। सवाल ये उठता है – क्या यही आखिरी उपाय है? क्या कोई दूरदर्शी योजना नहीं बन सकती थी? गांव के बच्चों की शिक्षा पर संकट ये फैसला सीधे-सीधे दूरदराज़ के गांवों में रहने वाले बच्चों की शिक्षा को संकट में डाल देता है। उन बच्चों के लिए जो पहले ही शिक्षा से दूर थे, अब स्कूल ही बंद हो जाने से उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता। सरकारी आंकड़ों से परे, जमीनी सच्चाई ये है कि अब लोग अपने बच्चों को भारी फीस देकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना पसंद कर रहे हैं। क्यों? क्यों छोड़ा जा रहा है सरकारी स्कूल? शिक्षकों की भारी कमी है। जो शिक्षक हैं भी, वे पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते। स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं – न शौचालय, न पीने का पानी, न बैठने की व्यवस्था। कई जगहों पर जातिगत भेदभाव और धार्मिक पक्षपात बच्चों के मन में डर और हीन भावना भर देते हैं। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा अक्सर खुद को दोयम दर्जे का समझता है, और यह हमारे भविष्य के साथ अन्याय है। शराब के ठेके हर चौराहे पर – क्या यही विकास है? एक तरफ तो स्कूलों को बच्चों की संख्या कम होने पर बंद किया जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में 27,000 से ज़्यादा शराब के ठेके खोल दिए गए हैं। अब गांव के हर चौराहे, हर मोड़ पर शराब का ठेका मिल जाएगा। क्या सरकार के लिए राजस्व (revenue) बढ़ाना ही सबसे बड़ा मकसद रह गया है? क्या शराब से कमाए गए पैसे से ही हम राष्ट्र का निर्माण करेंगे? मीडिया और धर्म की राजनीति टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर अब दिन-रात सिर्फ हिंदू-मुस्लिम,मंदिर-मस्जिद, जाति और धर्म के झगड़े दिखाई देते हैं। असली मुद्दे – शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा – कहीं गुम हो गए हैं। मीडिया को अब देश के विकास से कोई लेना-देना नहीं। TRP की होड़ में वो बस आग लगाना जानती है। अब क्या किया जाए? गांव के स्कूलों को बंद करने की बजाय सुधार किया जाए। स्कूलों में स्थायी और प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति हो। स्थानीय पंचायत और समाजसेवी संस्थाओं को स्कूल संचालन में जोड़ा जाए। शराब के ठेकों की जगह पुस्तकालय, स्पोर्ट्स क्लब और स्किल सेंटर खोले जाएं। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और विश्वास को बहाल करने के लिए जन अभियान चलाया जाए। अंत में – शिक्षा ही राष्ट्र का भविष्य है। अगर हमने आज गांवों के स्कूल बंद कर दिए, तो कल गांवों से उजाला हमेशा के लिए चला जाएगा। शिक्षा का दीपक बुझ गया, तो देश की रोशनी भी बुझ जाएगी। समय है – हम सब एक साथ खड़े हों और कहें: "शिक्षा बचाओ – गांव बचाओ – देश बचाओ!" ✍️ स्वतंत्र लेखक / संपादक दुर्गेश यादव

सत्ता की राजनीति बनाम जनता के असली सवाल

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