बुधवार, 3 सितंबर 2025

लालू प्रसाद यादव : संघर्षों से तपकर निकला भारतीय राजनीति का बब्बर शेर

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अनेक ऐसे नेता हुए हैं, जिनकी पहचान केवल राजनीतिक पदों से नहीं बल्कि जनता के दिलों में दर्ज होती है। ऐसे ही नेताओं की सूची में एक अनोखा नाम है लालू प्रसाद यादव। वे केवल एक नेता नहीं बल्कि भारतीय राजनीति में एक ऐसी विचारधारा का प्रतीक हैं, जिसने ग़रीबों, पिछड़ों और वंचित तबके को केंद्र में लाकर खड़ा किया। लालू प्रसाद को अपदस्थ करने के लिए सत्ता के गलियारों में अनगिनत षड्यंत्र रचे गए। कभी 19 केंद्रीय मंत्री बनाकर उनका किला गिराने की कोशिश हुई, कभी सिनेमा के पर्दे पर उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया, और अंततः संसद में विशेष अध्यादेश तक लाया गया। लेकिन इसके बावजूद वे अपने संघर्ष, जुझारूपन और जनाधार से भारतीय राजनीति में एक बब्बर शेर की तरह खड़े रहे। सत्ता से हटाने का राष्ट्रीय प्रोजेक्ट 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी, तब बिहार से रिकॉर्ड 19 केंद्रीय मंत्री बनाए गए। भाजपा और उसके सहयोगियों ने खुलकर कहा कि यह कदम केवल लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक ताक़त को तोड़ने के लिए उठाया गया है। उस दौर में नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, जॉर्ज फ़र्नांडिस और कई दिग्गजों को केंद्र की राजनीति में जगह दी गई। लेकिन छह साल तक सत्ता में रहने के बाद भी लालू प्रसाद को हाशिये पर नहीं धकेला जा सका। 2004 : “इंडिया शाइनिंग” की हार और लालू की जीत 2004 के लोकसभा चुनाव भाजपा ने “इंडिया शाइनिंग” अभियान के साथ लड़ा। उस समय मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान को पूरा भरोसा था कि भाजपा फिर से सत्ता में आएगी। लेकिन बिहार की धरती पर लालू प्रसाद यादव ने चमत्कार कर दिया। उनकी पार्टी राजद ने 24 सीटें जीतकर एनडीए की रणनीति ध्वस्त कर दी। यूपीए सरकार बनी और लालू प्रसाद रेल मंत्री बने। यही वह दौर था जब उन्होंने भारतीय रेलवे को घाटे से उबारकर लाभ में लाकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। हार्वर्ड से लेकर वॉर्टन तक के बिजनेस स्कूलों ने उनके “रेलवे मॉडल” पर केस स्टडी तैयार की। सेना बुलाने तक की नौबत भारतीय राजनीति का यह भी एक अनोखा अध्याय है कि लालू प्रसाद यादव को गिरफ़्तार करने के लिए सेना बुलाने तक की तैयारी की गई। ऐसा किसी और नेता के साथ कभी नहीं हुआ। यह घटना बताती है कि उनकी राजनीतिक शक्ति किस स्तर तक थी और किस हद तक वे सत्ता प्रतिष्ठान के लिए चुनौती बन चुके थे। फ़िल्मों से राजनीति तक की तिकड़म सिर्फ़ राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक मोर्चे पर भी लालू यादव को घेरने की कोशिश की गई। बिहार के फ़िल्म निर्माता प्रकाश झा से गंगाजल और अपहरण जैसी फ़िल्में बनवाई गईं। इन फ़िल्मों को जनता ने लालू प्रसाद के राजनीतिक जीवन से जोड़कर देखा। बाद में यही प्रकाश झा नीतीश कुमार के टिकट पर लोकसभा चुनाव में उतरे। यह महज़ संयोग नहीं था, बल्कि राजनीति और सिनेमा के गठजोड़ से किसी नेता को बदनाम करने का सुनियोजित प्रयोग था। विशेष अध्यादेश और राजनीतिक शिकार लालू प्रसाद यादव पहले ऐसे नेता बने जिनके लिए संसद में विशेष अध्यादेश लाया गया। इस क़ानून के तहत उन्हें चुनाव लड़ने और सार्वजनिक जीवन से वंचित कर दिया गया। विडंबना यह है कि आज उसी देश की राजनीति में बलात्कार जैसे अपराधों में सजायाफ्ता लोग सत्ता का आनंद लेते हैं। लेकिन जिनके लिए “विशेष कानून” बनाया गया, वे लालू प्रसाद यादव ही थे। ग़रीबों का नेता और जनता का भरोसा लालू प्रसाद यादव की असली ताक़त सत्ता नहीं बल्कि जनता थी। उनका अंदाज़, उनकी भाषा और उनका बोलने का तरीका सीधा आम आदमी से जुड़ता था। गाँव का किसान उन्हें अपना मानता था। दलित-पिछड़े उनके भाषणों में अपना भविष्य देखते थे। मुसलमानों ने उन्हें अपनी सुरक्षा का प्रतीक माना। यही कारण था कि विपक्षी उन्हें चाहे जितना “गँवार” कहें, लेकिन ग़रीबों की भीड़ उन्हें “माई का लाल” कहती रही। स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच अडिग लालू प्रसाद यादव का जीवन व्यक्तिगत संघर्षों से भी भरा रहा है। उन्होंने ओपन हार्ट सर्जरी करवाई। किडनी ट्रांसप्लांट से गुज़रे। एक दर्जन से अधिक गंभीर बीमारियों से लड़ रहे हैं। इसके बावजूद वे 75 वर्ष की उम्र में भी पूरी ऊर्जा और जज़्बे के साथ राजनीतिक मैदान में सक्रिय हैं। यही उन्हें भारतीय राजनीति का योद्धा बनाता है। भाषण और तर्क की अद्भुत क्षमता लालू प्रसाद यादव को भीड़ को साधने की कला बख़ूबी आती थी। वे कठिन से कठिन मुद्दे को सरल भाषा में जनता तक पहुँचाते थे। उनके भाषणों में हँसी-ठिठोली भी होती थी और गंभीर राजनीतिक तर्क भी। वे विरोधियों पर व्यंग्य करते हुए भी उन्हें व्यक्तिगत शत्रु नहीं मानते थे। यही कारण है कि उनका अंदाज़ जनता को आकर्षित करता और विरोधियों को असहज बना देता। अगर वे भी “धूर्त राजनीति” करते तो… लालू प्रसाद यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप जरूर लगे, लेकिन उन्होंने कभी राजनीति को प्रतिशोध और षड्यंत्र का साधन नहीं बनाया। यदि वे अपने विरोधियों की तरह ईर्ष्या और धूर्तता से राजनीति करते, तो आज कई बड़े नेताओं का चेहरा उजागर हो चुका होता। उनकी यह खासियत उन्हें भीड़ से अलग करती है। निष्कर्ष लालू प्रसाद यादव भारतीय राजनीति का वह नाम हैं जिन्हें मिटाने की तमाम कोशिशें हुईं, लेकिन हर बार वे और मज़बूत होकर उभरे। सत्ता के षड्यंत्र, मीडिया की नकारात्मक छवियाँ, विशेष अध्यादेश और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ—इन सबके बावजूद वे आज भी ग़रीबों और पिछड़ों की उम्मीद बने हुए हैं। वे सचमुच भारतीय राजनीति के बब्बर शेर हैं, जिनकी दहाड़ आज भी समाजवाद के गलियारों में गूँजती है। साहब, आपके जज़्बे को सलाम। समाजवाद ज़िंदाबाद। ✍️ लेखक :दुर्गेश यादव!

सोमवार, 1 सितंबर 2025

भारत-चीन संबंध: व्यापार, विश्वास और सीमा विवादों का विश्लेषण

लेखक: दुर्गेश यादव आज की वैश्विक राजनीति में भारत और चीन के बीच संबंध एक जटिल पहेली की तरह हैं। दोनों देश एशिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र और आर्थिक शक्ति हैं, लेकिन सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इनके बीच तनाव पैदा करती रहती है। 2025 में, जब दुनिया अमेरिकी टैरिफ्स और वैश्विक मंदी से जूझ रही है, भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों में कुछ सुधार के संकेत दिख रहे हैं, लेकिन विश्वास की कमी और ऐतिहासिक घटनाएं इनकी दोस्ती पर सवाल उठाती हैं। क्या भारत-चीन व्यापार से वास्तव में दोनों को फायदा हो रहा है? क्या दोनों देशों की दोस्ती पर भरोसा किया जा सकता है? क्या चीन ने भारत-पाक युद्धों में पाकिस्तान का साथ दिया था? गलवान घाटी में हालात सुधरे हैं या नहीं? और क्या चीन कभी भारत के क्षेत्रों से कब्जा हटा लेगा? इन सभी मुद्दों पर एक तार्किक विश्लेषण आवश्यक है। यह लेख इन सवालों का सरल भाषा में उत्तर देगा, तथ्यों और हालिया घटनाओं के आधार पर। भारत-चीन व्यापार: असंतुलन का बोझ भारत पर भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध तेजी से बढ़े हैं। 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 113.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें भारत का निर्यात 14.25 अरब डॉलर और आयात 113.5 अरब डॉलर रहा। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन यह संबंध असमान है। भारत का व्यापार घाटा 99.2 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले साल के 85.1 अरब डॉलर से अधिक है। भारत मुख्य रूप से कच्चे माल जैसे लौह अयस्क, झींगा और कास्टर ऑयल निर्यात करता है, जबकि चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर सेल्स और दवाओं के कच्चे माल आयात होते हैं। इस व्यापार से चीन को अधिक फायदा हो रहा है। चीन भारत को कच्चा माल बेचकर मूल्यवर्धन करता है और भारत की अर्थव्यवस्था पर निर्भरता बढ़ाता है। उदाहरणस्वरूप, भारत की 82.7 प्रतिशत सोलर सेल्स और 75.2 प्रतिशत लिथियम-आयन बैटरी चीन से आती हैं। अमेरिकी टैरिफ्स के कारण 2025 में भारत-चीन व्यापार बढ़ा है, क्योंकि दोनों देश अमेरिकी दबाव से बचने के लिए एक-दूसरे की ओर रुख कर रहे हैं। हाल ही में, सीधे उड़ानें बहाल हुईं और सीमा व्यापार फिर शुरू हुआ, जैसे लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला पास पर। लेकिन भारत के लिए यह फायदेमंद नहीं। व्यापार घाटा भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है और चीन पर निर्भरता बढ़ाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को 'चाइना प्लस वन' रणनीति अपनानी चाहिए, जहां विदेशी निवेश को विविधीकृत किया जाए। 2025 के बजट में भारत ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) और उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना को मजबूत किया है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो। फिर भी, चीन के टैरिफ बैरियर जैसे कृषि उत्पादों पर 5-25 प्रतिशत शुल्क भारत के निर्यात को रोकते हैं। कुल मिलाकर, व्यापार से चीन को आर्थिक लाभ मिल रहा है, जबकि भारत घाटे का शिकार हो रहा है। भारत को संतुलित व्यापार के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज करने होंगे। भारत-चीन दोस्ती: विश्वास का संकट क्या भारत और चीन की दोस्ती पर भरोसा किया जा सकता है? इतिहास और वर्तमान घटनाएं कहती हैं कि नहीं। दोनों देशों के बीच 1962 का युद्ध, 2017 का डोकलाम स्टैंडऑफ और 2020 का गलवान संघर्ष विश्वास की कमी को दर्शाते हैं। 2025 में, अमेरिकी टैरिफ्स के कारण दोनों देश करीब आए हैं। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अक्टूबर 2024 की ब्रिक्स बैठक में 'सकारात्मक दिशा' की बात हुई, और सीधे उड़ानें बहाल हुईं। लेकिन यह सतही है। चीन भारत को 'साझेदार' कहता है, लेकिन उसके कार्य उलटे हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) भारत-प्रशासित कश्मीर से गुजरता है, जो भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है। चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नाम बदले, जो भारत का अभिन्न अंग है। विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन की 'सालामी स्लाइसिंग' रणनीति से वह धीरे-धीरे क्षेत्र हथिया रहा है। 2025 में, स्कॉ समिट में मोदी और शी की मुलाकात हुई, लेकिन सीमा पर 50,000 सैनिक अभी भी तैनात हैं। भारत को चीन पर भरोसा नहीं करना चाहिए। दोनों की वैश्विक महत्वाकांक्षाएं टकराती हैं – भारत क्वाड और इंडो-पैसिफिक में अमेरिका के साथ है, जबकि चीन बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से प्रभाव बढ़ा रहा है। दोस्ती संभव है, लेकिन केवल यदि चीन सीमा विवाद सुलझाए। फिलहाल, सतर्कता आवश्यक है। ## भारत-पाक युद्धों में चीन का साथ: पाकिस्तान का 'सबसे अच्छा दोस्त' क्या चीन ने भारत-पाक युद्धों में पाकिस्तान का साथ नहीं दिया? इतिहास हां कहता है। 1965 के युद्ध में, चीन ने भारत को सिक्किम सीमा पर सैन्य संरचनाएं हटाने का अल्टीमेटम दिया, जिससे भारत की सेना पश्चिमी मोर्चे पर कमजोर हुई। चीन ने पाकिस्तान को 250 मिलियन डॉलर का सैन्य सहायता दिया। 1971 के युद्ध में, चीन ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का समर्थन किया और पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना की निकासी के लिए जहाज भेजे। हालांकि सीधे हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन हथियार और कूटनीतिक सहायता दी। 2025 में भी, चीन पाकिस्तान का 'सबसे अच्छा दोस्त' है। सीपीईसी के तहत 62 अरब डॉलर का निवेश, जिसमें ग्वादर बंदरगाह शामिल है, पाकिस्तान को मजबूत करता है। हाल के भारत-पाक तनाव में, चीन ने पाकिस्तान को एचक्यू-9 मिसाइलें और जे-10 विमान दिए। चीन भारत को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति का हिस्सा है, जहां पाकिस्तान चीन का हथियार है। भारत को सतर्क रहना होगा। गलवान घाटी: हालात सुधरे, लेकिन पूरी तरह नहीं 2020 का गलवान संघर्ष भारत-चीन संबंधों का टर्निंग पॉइंट था। 15 जून को, 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जबकि चीन ने 4 की मौत मानी (अमेरिकी खुफिया के अनुसार 35)। यह 45 वर्षों में पहली घातक टकराव था। संघर्ष के बाद, दोनों पक्षों ने 50,000 सैनिक तैनात किए। 2025 तक, हालात सुधरे हैं। 2024 के अक्टूबर समझौते से डिसएंगेजमेंट हुआ – पांगोंग त्सो, गलवान और डेपसांग से सैनिक हटे। अब पैट्रोलिंग बहाल है। लेकिन डे-इंडक्शन (सैनिकों की वापसी) नहीं हुआ। 2025 में, स्कॉ समिट में मोदी-शी मुलाकात से सकारात्मक संकेत मिले, लेकिन 100,000 सैनिक अभी भी हैं। भारत ने बुनियादी ढांचा मजबूत किया, जैसे डीएसडीबीओ सड़क। सुधार हुआ, लेकिन पूर्ण सामान्य नहीं। तनाव बरकरार है। चीन का कब्जा: हटेगा या नहीं? क्या चीन भारत के क्षेत्रों से कब्जा हटा लेगा? संभावना कम है। चीन ने 38,000 वर्ग किमी अक्साई चिन पर कब्जा रखा है, जो लद्दाख का हिस्सा है। 2020 के बाद, डेपसांग और डेमचोक में 2,000 वर्ग किमी पर नियंत्रण बढ़ा। 2023 में, चीन ने हॉटन में दो नए काउंटी बनाए, जो लद्दाख में आते हैं। भारत ने विरोध किया, लेकिन चीन ने नामकरण जारी रखा। चीन की 'ग्रे जोन' रणनीति से वह धीरे-धीरे क्षेत्र हथिया रहा है। 2025 में, डिसएंगेजमेंट से कुछ राहत मिली, लेकिन पूर्ण वापसी नहीं। विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन कभी नहीं हटेगा, जब तक भारत मजबूत न हो। भारत को सैन्य आधुनिकीकरण और कूटनीति से दबाव बनाना होगा। निष्कर्ष: सतर्कता और संतुलन की आवश्यकता भारत-चीन संबंधों में व्यापार असंतुलन, ऐतिहासिक अविश्वास और सीमा विवाद चुनौतियां हैं। व्यापार से चीन लाभान्वित हो रहा, जबकि भारत घाटे में। दोस्ती संभव, लेकिन विश्वास की कमी बाधा। चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया, गलवान में सुधार हुआ लेकिन अपूर्ण, और कब्जा हटाने की उम्मीद कम। भारत को सैन्य शक्ति, आर्थिक स्वावलंबन और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से मजबूत होना होगा। 2025 में, दोनों देशों को शांति के लिए प्रयास करने चाहिए, लेकिन भारत को सतर्क रहना होगा। केवल संतुलित दृष्टिकोण से ही स्थिरता आएगी।

रविवार, 31 अगस्त 2025

चीन पर बढ़ती निर्भरता और भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हाल ही में यह चिंता जताई कि भारत लगातार चीन के उत्पादों पर अधिक निर्भर होता जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यही रफ्तार जारी रही, तो इसका असर न केवल भारत के औद्योगिक ढांचे पर पड़ेगा बल्कि देश की व्यापारिक स्थिति भी कमजोर हो जाएगी। अखिलेश यादव का तर्क है कि चीन पहले भारतीय बाज़ारों को सस्ते और बड़े पैमाने पर उपलब्ध अपने उत्पादों से भर देता है, जिससे घरेलू उद्योग धीरे-धीरे कमजोर हो जाते हैं। बाद में जब भारतीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा खो बैठती हैं, तब चीन अपनी मर्जी से कीमतें तय कर बाजार पर एक तरह से नियंत्रण कर लेता है। यह चिंता सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था के सामने खड़े एक गहरे प्रश्न की ओर संकेत करती है। आज के दौर में "आत्मनिर्भर भारत" का नारा दिया जा रहा है, "मेक इन इंडिया" को बढ़ावा दिया जा रहा है और स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहित करने की नीतियां बनाई जा रही हैं। लेकिन जमीन पर सच्चाई कुछ और है। भारत का आयात-निर्यात संतुलन इस बात को साफ दिखाता है कि हम चीन पर भारी मात्रा में निर्भर बने हुए हैं। भारत-चीन व्यापारिक तस्वीर भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों को देखें तो पिछले एक दशक में इसमें लगातार बढ़ोतरी हुई है। भारत चीन से इलेक्ट्रॉनिक सामान, मोबाइल फोन, मशीनरी, खिलौने, कपड़े, औद्योगिक उपकरण और यहां तक कि त्योहारों में इस्तेमाल होने वाली सजावटी वस्तुएं तक आयात करता है। 2024 तक के आंकड़े बताते हैं कि भारत का चीन के साथ व्यापारिक घाटा 100 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। यानी भारत चीन से जितना माल खरीदता है, उसके मुकाबले चीन भारत से बहुत कम माल खरीदता है। यह असंतुलन लंबे समय में भारतीय उद्योग के लिए गंभीर खतरा है। घरेलू उद्योग पर असर चीन की ताकत सस्ते उत्पादन और बड़े पैमाने पर निर्माण क्षमता में है। वहां की कंपनियां कम लागत पर बड़े पैमाने पर उत्पाद तैयार करती हैं। इसका असर भारतीय छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME सेक्टर) पर सीधा पड़ता है। इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल सेक्टर : भारतीय कंपनियां यहां टिक ही नहीं पातीं। त्योहार और सजावटी सामान : दिवाली की लाइटें, होली के रंग, राखियां और यहां तक कि गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां तक चीन से आकर बाजार में छा जाती हैं। मशीनरी और औद्योगिक उपकरण : छोटे उद्योगों को भी चीनी उपकरणों पर निर्भर होना पड़ता है। इस निर्भरता से स्थानीय उत्पादन क्षमता कमजोर होती है। उद्योगपति और कारीगर धीरे-धीरे बाजार से बाहर होने लगते हैं, जिससे रोजगार पर भी सीधा असर पड़ता है। रणनीतिक खतरे यह मुद्दा सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। चीन भारत का पड़ोसी और कभी-कभी प्रतिद्वंद्वी देश है। सीमा विवाद से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक, दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति कई बार सामने आती रही है। ऐसे में अगर भारत की अर्थव्यवस्था चीन के सामानों पर ज्यादा निर्भर होती चली जाए तो यह भविष्य में दबाव का कारण बन सकता है। अखिलेश यादव की चिंता यहीं पर अधिक प्रासंगिक हो जाती है। अगर चीन किसी दौर में कीमतें बढ़ा दे या किसी खास उत्पाद की सप्लाई रोक दे, तो भारत के उद्योग और बाजार हिल सकते हैं। उदाहरण के लिए, कोविड-19 महामारी के दौरान जब चीन से दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की सप्लाई प्रभावित हुई, तब भारत को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। क्या है समाधान? घरेलू उद्योगों को मजबूत करना छोटे और मध्यम उद्योगों को आसान ऋण, तकनीकी सहायता और आधुनिक मशीनों तक पहुंच दिलाना जरूरी है। "मेक इन इंडिया" अभियान को सिर्फ नारेबाजी से आगे बढ़ाकर ज़मीनी स्तर पर लागू करना होगा। टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और मोबाइल निर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत को अपनी क्षमता विकसित करनी होगी। सरकार ने सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन उन्हें तेज़ी और पारदर्शिता के साथ लागू करना जरूरी है। स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा त्योहारों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं में "स्वदेशी" उत्पादों को प्राथमिकता देनी होगी। इसके लिए उपभोक्ताओं की सोच भी बदलनी होगी। जब तक लोग सस्ते चीनी सामान को प्राथमिकता देंगे, तब तक स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना मुश्किल होगा। निर्यात बढ़ाना भारत को अपने निर्यात के क्षेत्र बढ़ाने होंगे। टेक्सटाइल, फार्मा, आईटी और कृषि उत्पादों में भारत की बड़ी क्षमता है। निर्यात बढ़ाकर ही व्यापार घाटे को संतुलित किया जा सकता है। राजनीति और अर्थशास्त्र का संगम अखिलेश यादव का बयान केवल राजनीतिक विरोध के लिए नहीं माना जाना चाहिए। यह एक गंभीर आर्थिक चेतावनी है। आज भले ही भारतीय बाजार सस्ते चीनी सामान से भरे हों और उपभोक्ता इसे "किफायती विकल्प" मानते हों, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा के खिलाफ है। राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि विदेशी सामानों के खिलाफ केवल बयानबाजी या बहिष्कार का नारा पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ठोस नीतियां, अनुसंधान में निवेश, नवाचार को प्रोत्साहन और स्थानीय उद्योगों को सुरक्षा कवच देना आवश्यक है। निष्कर्ष भारत का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि वह चीन पर अपनी निर्भरता कैसे घटाता है और किस हद तक अपने उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाता है। अखिलेश यादव की यह चिंता समयानुकूल है और इसे केवल विपक्ष का बयान कहकर नज़रअंदाज़ करना गलत होगा। अगर भारत वास्तव में आत्मनिर्भर बनना चाहता है, तो उसे घरेलू उत्पादन, तकनीकी विकास और स्थानीय उद्यमिता को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा चीन का वह मॉडल हावी रहेगा, जिसमें पहले वह बाजार पर कब्जा करता है और बाद में अपनी शर्तों पर सौदे करवाता है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, उद्योग और उपभोक्ता – तीनों मिलकर स्थानीय उत्पादों और उद्योगों को मजबूत करें। तभी भारत आर्थिक रूप से सुरक्षित और स्वतंत्र बन सकेगा। ✍️लेखक : दुर्गेश यादव!

एससीओ शिखर सम्मेलन में मोदी-जिनपिंग मुलाकात: आतंकवाद और कनेक्टिविटी पर वैश्विक दक्षिण के लिए नए संकेत

✍️ लेखक: दुर्गेश यादव! तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन इस बार विशेष रूप से चर्चा में रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई मुलाकात ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों पर, बल्कि पूरे यूरेशियन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति पर गहरा असर डाला। पूर्व विदेश सचिव शशांक ने इस मुलाकात को लेकर कहा, “एससीओ, वैश्विक दक्षिण और यूरेशियन तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्रों के प्रमुख सदस्यों का दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है, जो महत्वपूर्ण है। हालांकि प्राथमिकताएं होनी चाहिए – पहली, आतंकवाद पर लगाम लगाना और दूसरी, भविष्य के लिए बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी का निर्माण करना।”* उनकी यह टिप्पणी न केवल भारत-चीन संबंधों को समझने का आधार देती है, बल्कि आने वाले वर्षों की वैश्विक कूटनीति को भी दिशा दिखाती है। एससीओ की बढ़ती अहमियत शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना 2001 में हुई थी और इसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके पूर्ण सदस्य बने। आज एससीओ एशिया के सबसे बड़े बहुपक्षीय मंचों में गिना जाता है, जहां रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान, मध्य एशियाई देश और अब ईरान जैसे देश भी शामिल हैं। इस संगठन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें एक साथ वैश्विक दक्षिण (Global South), यूरेशियन क्षेत्र और हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े देश शामिल हैं। यही कारण है कि एससीओ केवल एक क्षेत्रीय मंच नहीं, बल्कि एक वैश्विक कूटनीतिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। मोदी-जिनपिंग मुलाकात का महत्व भारत और चीन के बीच संबंध पिछले कुछ वर्षों में तनावपूर्ण रहे हैं, खासकर सीमा विवाद और गलवान की घटनाओं के बाद। ऐसे में तियानजिन में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात को एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इस बैठक का सबसे बड़ा संदेश यह है कि दोनों देश अपने मतभेदों के बावजूद संवाद की राह बनाए रखना चाहते हैं। यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई है जब दुनिया ऊर्जा संकट, महंगाई, यूक्रेन युद्ध और वैश्विक दक्षिण की चुनौतियों से जूझ रही है। भारत और चीन यदि सहयोग के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं तो यह पूरे एससीओ को नई ऊर्जा दे सकता है। आतंकवाद पर लगाम: साझा प्राथमिकता शशांक ने सही कहा कि एससीओ की पहली प्राथमिकता आतंकवाद पर लगाम लगाना होनी चाहिए। 1.क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक– मध्य एशिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियां अभी भी बड़ी चुनौती हैं। यदि इन पर नियंत्रण नहीं होता तो व्यापार और कनेक्टिविटी की कोई भी योजना असफल हो जाएगी। 2.भारत की सुरक्षा चिंता – भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का शिकार रहा है। इसलिए एससीओ मंच भारत के लिए आतंकवाद पर वैश्विक सहमति बनाने का एक अवसर है। 3.चीन की चिंता – चीन के लिए भी शिंजियांग क्षेत्र में उग्रवाद और आतंकवाद एक समस्या है। इस लिहाज से भारत और चीन का सहयोग एक साझा मंच पर संभव हो सकता है। कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा: भविष्य की कुंजी एससीओ का दूसरा बड़ा एजेंडा है कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर। अंतरराष्ट्रीय कॉरिडोर: चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और भारत की इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को जोड़ सकते हैं। ऊर्जा सहयोग: रूस, ईरान और मध्य एशिया ऊर्जा संपन्न क्षेत्र हैं जबकि भारत और चीन बड़े उपभोक्ता हैं। बेहतर कनेक्टिविटी से ऊर्जा व्यापार सुगम होगा। डिजिटल कनेक्टिविटी: भविष्य केवल सड़कों और रेल का नहीं है, बल्कि डिजिटल और तकनीकी सहयोग का भी है। एससीओ इस दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वैश्विक दक्षिण के लिए संकेत शशांक ने अपनी टिप्पणी में खासतौर पर वैश्विक दक्षिण (Global South) का जिक्र किया। वैश्विक दक्षिण के देश विकासशील अर्थव्यवस्थाएं हैं जिन्हें बुनियादी ढांचे और सुरक्षा दोनों की आवश्यकता है। एससीओ का मंच इन देशों को पश्चिमी देशों से अलग एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है। भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों की उपस्थिति से वैश्विक दक्षिण के छोटे देशों को रणनीतिक संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है। यूरेशियन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भूमिका एससीओ के भीतर सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दो बड़े भू-राजनीतिक क्षेत्रों – यूरेशिया और हिंद-प्रशांत – को जोड़ता है। यूरेशियन क्षेत्र: यहां रूस और मध्य एशियाई देश प्रमुख खिलाड़ी हैं। ऊर्जा, सुरक्षा और भू-राजनीति यहां की प्रमुख चुनौतियां हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र: भारत, चीन और समुद्री व्यापार मार्ग इस क्षेत्र को वैश्विक शक्ति केंद्र बनाते हैं। यदि एससीओ इन दोनों क्षेत्रों को साझा हितों के आधार पर जोड़ता है, तो यह पश्चिमी गठबंधनों का एक सशक्त विकल्प बन सकता है। भारत की भूमिका भारत के लिए एससीओ केवल एक बहुपक्षीय मंच नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यह भारत को मध्य एशिया और रूस से जोड़ता है। भारत को आतंकवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर देता है। ऊर्जा और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में भारत की भूमिका को मजबूत करता है। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग का एक संतुलित रास्ता दिखाता है। चुनौतियां और संभावनाएं हालांकि संभावनाएं बहुत हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं। 1.भारत-चीन सीमा विवाद – यदि इस पर ठोस प्रगति नहीं होती तो द्विपक्षीय सहयोग सीमित रह जाएगा। 2.पाकिस्तान की भूमिका – पाकिस्तान का रवैया एससीओ की एकता को प्रभावित कर सकता है। 3.पश्चिमी दबाव – अमेरिका और यूरोपीय देशों की नीतियां भी एससीओ देशों के फैसलों पर असर डालती हैं। इसके बावजूद, यदि भारत और चीन संवाद और सहयोग को आगे बढ़ाते हैं तो एससीओ भविष्य में वैश्विक व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बन सकता है। निष्कर्ष तियानजिन शिखर सम्मेलन में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात केवल एक औपचारिक घटना नहीं थी, बल्कि वैश्विक दक्षिण और यूरेशियन-हिंद प्रशांत क्षेत्र के लिए नए संकेत थी। पूर्व विदेश सचिव शशांक की यह राय कि *“पहली प्राथमिकता आतंकवाद पर लगाम लगाना और दूसरी प्राथमिकता कनेक्टिविटी का निर्माण करना”– वास्तव में आने वाले वर्षों के लिए एससीओ के रोडमैप का आधार हो सकती है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह एससीओ के माध्यम से अपनी वैश्विक भूमिका को और मजबूत करे, जबकि चीन के लिए यह मौका है कि वह सहयोग की राह पर चलते हुए विश्वास बहाल करे। यदि दोनों देश यह जिम्मेदारी निभाते हैं, तो एससीओ वास्तव में 21वीं सदी का सबसे प्रभावशाली बहुपक्षीय संगठन बन सकता है।

शनिवार, 30 अगस्त 2025

"बिहार की सच्चाई – 1990 से पहले के 30 साल और आज का सवाल"

✍️ लेखक: दुर्गेश यादव आज जब भी बिहार की राजनीति और उसकी प्रगति या दुर्गति पर चर्चा होती है, तो कुछ लोग आँकड़े उठाकर 1990 के बाद का समय गिनाना शुरू कर देते हैं। खासतौर पर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर जैसे लोग अक्सर यह कहते हैं कि 1990 से अब तक बिहार पिछड़ता चला गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या 1990 से पहले बिहार स्वर्गलोक था? क्या उस समय के शासकों ने बिहार को विकास, समानता और सम्मान का कोई ऐसा मॉडल दिया था, जिस पर गर्व किया जा सके? 30 साल तक एक ही वर्ग का शासन 1952 से 1990 तक बिहार की सत्ता पर ज्यादातर समय सवर्ण जाति के नेता मुख्यमंत्री रहे। 1. डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (भूमिहार) 2. बिनोदानंद झा (ब्राह्मण) 3. हरिहर सिंह (राजपूत) 4. केदार पांडे (ब्राह्मण) 5. चंद्रशेखर सिंह (राजपूत) 6. बिंदेश्वरी दुबे (ब्राह्मण) 7. भागवत झा आज़ाद (ब्राह्मण) 8. सत्येंद्र नारायण सिन्हा (राजपूत) 9. जगन्नाथ मिश्रा (ब्राह्मण) इनके कार्यकाल को जोड़ दिया जाए, तो लगभग 35 साल तक बिहार पर एक ही वर्ग का दबदबा रहा। सवाल उठता है कि इन दशकों में बिहार को क्या मिला? सामाजिक यथार्थ – विकास से वंचित समाज उस दौर में बिहार शिक्षा, उद्योग और रोज़गार में लगातार पिछड़ता रहा। साक्षरता दर देश में सबसे नीचे रही। उद्योग धंधे चौपट हो गए, पलायन बढ़ा। सड़क, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे मूलभूत क्षेत्र उपेक्षित रहे। लेकिन इन सबके बीच सबसे कड़वी सच्चाई सामाजिक असमानता की थी। दलितों और पिछड़ों की स्थिति आज जब हम लोकतंत्र, अधिकार और समानता की बात करते हैं, तो याद रखना चाहिए कि 1990 से पहले बिहार के गाँवों में दलितों और पिछड़ों की हालत इंसान से भी बदतर थी। दलितों को "स्तन टैक्स" और "मुँह देखने का टैक्स" जैसी अमानवीय प्रथाएँ झेलनी पड़ती थीं। वे स्कूल में पढ़ने का सपना भी नहीं देख सकते थे। गाँव की सड़कों पर सर उठाकर चलना उनके लिए अपराध माना जाता था। ज़मींदार और सामंती ताक़तें उन्हें इंसान से कमतर समझती थीं। क्या यह सब उन्हीं 30 साल के शासनकाल में नहीं हुआ, जब सवर्ण मुख्यमंत्री सत्ता में थे? प्रशांत किशोर का एकतरफा लेखा-जोखा आज प्रशांत किशोर उर्फ प्रशांत पांडे बिहार के भविष्य और वर्तमान की गिनती करते हुए 1990 के बाद की राजनीति पर सवाल उठाते हैं। वे लालू-राबड़ी राज की आलोचना करते हैं, नीतीश कुमार की नीतियों पर प्रश्न खड़े करते हैं। लेकिन वे कभी यह नहीं बताते कि 1952 से 1990 तक सत्ता पर काबिज नेताओं ने बिहार को किस हालत में छोड़ा था। अगर उस दौर में शिक्षा, रोज़गार, समानता और न्याय का माहौल बनाया गया होता, तो क्या 1990 के बाद की राजनीति में "सामाजिक न्याय" का नारा इतना प्रबल हो पाता? असली सवाल बिहार की जनता से 30 साल तक सत्ता का सुख भोगने वाले इन नेताओं ने क्या एक भी ऐसा मॉडल खड़ा किया, जिस पर आज बिहार गर्व कर सके? क्या उन्होंने समाज के सबसे वंचित वर्गों को बराबरी का हक़ दिया? क्या उन्होंने गरीबी, अशिक्षा और असमानता से बिहार को निकालने का कोई गंभीर प्रयास किया? सच्चाई यह है कि उन्होंने बिहार को सामंती ढाँचे में जकड़े रखा। विकास की बजाय वर्चस्व और जातिगत वर्चस्व की राजनीति हावी रही। निष्कर्ष बिहार की दुर्गति की जड़ केवल 1990 के बाद की राजनीति में नहीं है। उसकी नींव तो 1952 से 1990 के बीच ही रख दी गई थी, जब एक ही वर्ग की राजनीति ने राज्य को शिक्षा, उद्योग और सामाजिक न्याय से वंचित रखा। इसलिए यदि प्रशांत किशोर या कोई भी विश्लेषक ईमानदारी से बिहार की तस्वीर पेश करना चाहते हैं, तो उन्हें पूरे इतिहास को देखना होगा, न कि आधा-अधूरा लेखा-जोखा पेश करना। बिहार की असली कहानी यह है कि यहाँ के गरीब, दलित, पिछड़े और वंचित तब भी हाशिए पर थे और आज भी संघर्ष कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि 1990 के बाद उन्होंने अपनी आवाज़ उठानी शुरू की।

शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

अवध की राजनीति और ठाकुर नेतृत्व की जद्दोजहद

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यह समीकरण समय-समय पर बदलते रहते हैं, लेकिन सामाजिक आधार के हिसाब से कुछ जातियां और समुदाय लगातार अपनी पकड़ बनाए रखते हैं। इन्हीं में से एक है ठाकुर यानी क्षत्रिय समाज। पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा लंबे समय से ठाकुर नेताओं के प्रभाव में रहा है। रायबरेली, अमेठी और प्रतापगढ़ जैसे ज़िलों में तो ठाकुर नेताओं की एक पूरी परंपरा दिखाई देती है। इस पृष्ठभूमि में जब प्रदेश सरकार के पर्यटन मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह रायबरेली विधायक मनोज पांडे द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे, तो राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें उनके इस दौरे पर टिक गईं। जयवीर सिंह का उद्देश्य साफ दिखाई देता है—वे खुद को प्रदेश में एक बड़े ठाकुर नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अवध की यह ज़मीन उनके लिए उपजाऊ साबित होगी, या फिर पहले से जमे हुए ठाकुर नेताओं के बीच उनकी पहचान बनाने में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ेगा? अवध में ठाकुर नेतृत्व की लंबी परंपरा अवध क्षेत्र की राजनीति में ठाकुर नेताओं की उपस्थिति नई नहीं है। प्रतापगढ़ के राजा भैया (रघुराज प्रताप सिंह) तीन दशकों से अधिक समय से एक प्रभावशाली ठाकुर चेहरा बने हुए हैं। अमेठी और रायबरेली में संजय सिंह जैसे नेताओं ने न केवल स्थानीय राजनीति बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई। इसी कड़ी में मंत्री दिनेश सिंह और राकेश सिंह भी अपने-अपने इलाकों में मज़बूत राजनीतिक आधार रखते हैं। इन नेताओं का प्रभाव सिर्फ एक विधानसभा या ज़िला तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका असर पड़ोसी क्षेत्रों तक भी महसूस किया जाता है। यही कारण है कि अवध बेल्ट में नए ठाकुर नेता के लिए जगह बनाना आसान नहीं है। जयवीर सिंह की चुनौती पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने अब तक खुद को प्रशासनिक और संगठनात्मक क्षमताओं के बल पर स्थापित किया है। वे पार्टी में लंबे समय से सक्रिय हैं और कई बार विभिन्न ज़िम्मेदारियां निभा चुके हैं। लेकिन ठाकुर नेता के रूप में उन्हें जिस बड़े स्तर की स्वीकार्यता चाहिए, वह फिलहाल उन्हें नहीं मिल पाई है। रायबरेली, अमेठी और प्रतापगढ़ जैसे ज़िलों में पहले से मौजूद बड़े नामों की वजह से जयवीर सिंह के लिए यहां पांव जमाना कठिन होगा। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वे वास्तव में ठाकुर समाज के बड़े नेता के रूप में पहचान बनाना चाहते हैं, तो उन्हें अवध की बजाय मैनपुरी और फर्रुखाबाद जैसे इलाकों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जहां ठाकुर समुदाय की अच्छी खासी संख्या है लेकिन वहां कोई सर्वमान्य ठाकुर चेहरा अभी उभर कर सामने नहीं आया। अवध में समीकरण क्यों कठिन हैं? अवध क्षेत्र में ठाकुर नेतृत्व का दबदबा ऐतिहासिक और सामाजिक दोनों कारणों से मजबूत है। यहां के ठाकुर घराने न सिर्फ़ आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली रहे हैं, बल्कि लंबे समय से राजनीति में भी सक्रिय हैं। जनता के बीच उनका एक सीधा रिश्ता बना हुआ है। इसके अलावा, अवध में ठाकुर नेताओं की छवि महज़ जातीय राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई बार उन्होंने विकास, सामाजिक सरोकार और जनसरोकार के मुद्दों पर भी नेतृत्व किया है। यही कारण है कि उनके लिए जनता का विश्वास एक परंपरा की तरह बना हुआ है। ऐसे में किसी नए नेता का यहां आकर जगह बनाना आसान नहीं है। जयवीर सिंह की रणनीति क्या हो सकती है? अगर जयवीर सिंह वास्तव में अवध में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं, तो उन्हें केवल ठाकुर पहचान के सहारे राजनीति करने की बजाय विकास और क्षेत्रीय मुद्दों पर जोर देना होगा। रायबरेली और अमेठी जैसे ज़िले कांग्रेस की विरासत माने जाते हैं और यहां भाजपा लगातार अपनी ज़मीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इस लिहाज से जयवीर सिंह का इन इलाकों में सक्रिय होना पार्टी के लिए लाभकारी हो सकता है। लेकिन जातीय नेतृत्व की होड़ में उन्हें लगातार यह महसूस कराया जाएगा कि यहां पहले से ही राजा भैया, संजय सिंह और दिनेश सिंह जैसे नाम मौजूद हैं। इस दबाव से बाहर निकलने के लिए उनकी रणनीति यह होनी चाहिए कि वे संगठनात्मक ढांचे और सरकारी योजनाओं को सीधे लोगों तक पहुंचाकर अपनी अलग पहचान गढ़ें। मैनपुरी और फर्रुखाबाद की संभावना राजनीतिक विश्लेषकों की राय में जयवीर सिंह के लिए मैनपुरी और फर्रुखाबाद की ज़मीन अपेक्षाकृत आसान साबित हो सकती है। मैनपुरी यादव राजनीति का गढ़ माना जाता है, लेकिन वहां ठाकुर समुदाय भी प्रभावशाली है। इसी तरह फर्रुखाबाद में भी ठाकुर वोट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यहां अगर जयवीर सिंह अपने समाज को संगठित कर पाते हैं तो उन्हें न सिर्फ़ क्षेत्रीय बल्कि प्रदेश स्तर पर भी एक मज़बूत ठाकुर नेता के रूप में पहचान मिल सकती है। ठाकुर नेतृत्व का भविष्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में ठाकुर नेता हमेशा अहम रहे हैं। आज भी योगी आदित्यनाथ खुद एक बड़े ठाकुर चेहरे के रूप में मौजूद हैं। लेकिन योगी आदित्यनाथ की राजनीति मुख्य रूप से गोरखपुर और पूर्वांचल क्षेत्र तक सीमित है। अवध और पश्चिमी यूपी में ठाकुर समाज को जोड़ने के लिए एक नए चेहरे की तलाश लगातार होती रहती है। जयवीर सिंह अगर इस चुनौती को स्वीकार कर सही रणनीति अपनाते हैं तो वे भविष्य में भाजपा के लिए एक बड़े ठाकुर नेता के रूप में सामने आ सकते हैं। लेकिन अगर वे केवल परंपरागत गढ़ों में ही अपनी पहचान बनाने की कोशिश करेंगे तो उन्हें लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ सकता है। निष्कर्ष पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह का रायबरेली दौरा और कार्यक्रम में उनकी सक्रियता निश्चित रूप से इस बात का संकेत है कि वे खुद को प्रदेश में एक बड़े ठाकुर नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन अवध क्षेत्र में पहले से मौजूद मज़बूत ठाकुर चेहरों की वजह से उनके लिए यह सफर आसान नहीं होगा। यदि वे वास्तव में प्रभावशाली नेतृत्व स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें मैनपुरी, फर्रुखाबाद और आसपास के उन इलाकों में अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी, जहां ठाकुर समाज संगठित तो है लेकिन उसके पास कोई बड़ा राजनीतिक नेतृत्व नहीं है। साथ ही उन्हें जातीय राजनीति से आगे बढ़कर विकास और जनता के मुद्दों पर अपनी पहचान गढ़नी होगी। अवध की राजनीति में जगह बनाना आसान नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो नेता धैर्य, रणनीति और सामाजिक संतुलन साध लेता है, वह अंततः जनता के दिलों तक पहुंच ही जाता है। जयवीर सिंह के सामने यही चुनौती है—क्या वे इस राह पर चलकर खुद को एक बड़े ठाकुर नेता के रूप में स्थापित कर पाएंगे या फिर अवध की मज़बूत परंपरा उनके लिए बाधा बन जाएगी? ✍️दुर्गेश यादव!

बुधवार, 27 अगस्त 2025

आत्मनिर्भर भारत या अदानीनिर्भर भारत?

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 में आत्मनिर्भर भारत का नारा दिया था, तब पूरे देश में आशा की एक नई लहर दौड़ी थी। कोरोना महामारी के कठिन समय में यह विचार लोगों को हिम्मत देने वाला साबित हुआ। लगा कि अब भारत अपनी आंतरिक शक्तियों पर भरोसा करेगा, विदेशी निर्भरता कम होगी और हर गाँव, हर कस्बे में रोजगार व उत्पादन के नए अवसर पैदा होंगे। “वोकल फॉर लोकल” का संदेश लोगों को यह विश्वास दिलाने वाला था कि सरकार अब सचमुच घरेलू उद्योगों, किसानों और छोटे कारोबारियों को मजबूती देने जा रही है। लेकिन कुछ वर्षों में यह उम्मीद धीरे-धीरे संदेह और मोहभंग में बदलने लगी है। आत्मनिर्भर भारत का नारा जितना प्रभावशाली सुनाई देता है, उतनी ही गहरी उसकी वास्तविकता पर सवाल उठने लगे हैं। स्वदेशी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारत में स्वदेशी आंदोलन की जड़ें गहरी हैं। आज़ादी की लड़ाई में स्वदेशी महज एक नारा नहीं था, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक था। महात्मा गांधी ने चरखे को अपनाकर यह संदेश दिया था कि असली स्वतंत्रता तभी संभव है जब हम अपने उत्पादन और अपनी आवश्यकताओं के लिए खुद पर निर्भर हों। आजादी के बाद भी स्वदेशी की अवधारणा बार-बार चर्चा में आती रही है। लेकिन मौजूदा समय में यह शब्द एक नए अर्थ में इस्तेमाल हो रहा है। मंचों से आत्मनिर्भरता की बात तो होती है, पर नीति और व्यवहार में उसका असर कम दिखाई देता है। बड़े उद्योग बनाम छोटे कारोबार सरकार की नीतियाँ हाल के वर्षों में बड़े उद्योगपतियों को अधिक लाभ पहुँचाने वाली दिखाई देती हैं। अदानी-अंबानी जैसे चुनिंदा कारोबारी घराने अभूतपूर्व विस्तार कर रहे हैं। वहीं, छोटे और मझोले उद्योग, जो देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार का बड़ा आधार हैं, लगातार संघर्ष कर रहे हैं। यदि आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य सचमुच छोटे उद्योगों को सशक्त करना होता, तो उन्हें आसान कर्ज़, तकनीकी सहायता और बाज़ार की गारंटी दी जाती। कुटीर उद्योगों, हथकरघा, हस्तशिल्प और कृषि आधारित उद्यमों को संरक्षण मिलता। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी जैसी नीतियों ने उलटे इन्हीं वर्गों को कमजोर कर दिया। विरोधाभास स्पष्ट है प्रधानमंत्री जी स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का आह्वान करते हैं, लेकिन सत्ता से जुड़े वर्ग स्वयं विदेशी तकनीक, विदेशी पूंजी और विदेशी उत्पादों पर निर्भर रहते हैं। उदाहरण के लिए, बड़े उद्योग विदेशी वित्तीय संस्थानों से निवेश लेते हैं, अत्याधुनिक तकनीक आयात करते हैं और अपने विस्तार के लिए विदेशी कर्ज़ पर निर्भर हैं। इस विरोधाभास से आम जनता में सवाल उठना स्वाभाविक है – यदि आत्मनिर्भरता वास्तव में सरकार की प्राथमिकता है तो यह केवल जनता से अपेक्षित क्यों है? सत्ता और उद्योगपति वर्ग के लिए विदेशी निर्भरता क्यों स्वीकृत है? जनता की बढ़ती बेचैनी भारत के ग्रामीण क्षेत्र, किसान और छोटे व्यापारी आज भी कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। रोजगार के अवसर सीमित हैं, महंगाई लगातार बढ़ रही है और सरकारी नौकरियों के अवसर घटते जा रहे हैं। युवाओं का पलायन जारी है। यदि आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होता, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और रोजगार के क्षेत्र में ठोस सुधार दिखाई देते। जनता धीरे-धीरे यह महसूस करने लगी है कि आत्मनिर्भरता का नारा वास्तविकता से अधिक प्रचार का हिस्सा है। छोटे और मझोले उद्योगों की स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है। आत्मनिर्भरता की असली परिभाषा आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है – 1. स्थानीय उद्योगों को सशक्त करना, 2. किसानों को तकनीक और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना, 3. युवाओं के लिए स्वरोजगार और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना, 4. शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत करना, 5. तकनीकी अनुसंधान और नवाचार में निवेश करना। यदि ये कदम उठाए जाते तो आत्मनिर्भर भारत नारे से आगे बढ़कर जमीनी हकीकत बन सकता था। सवाल जिनका उत्तर ज़रूरी है 1. क्या आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी पूरा होगा जब जनता विदेशी सामान छोड़े और बड़े उद्योगपति विदेशी पूंजी व तकनीक पर निर्भर बने रहें? 2. क्या सरकार ने छोटे उद्योगों और किसानों की बेहतरी के लिए उतने ही ठोस कदम उठाए हैं जितने बड़े उद्योगों के लिए? 3. क्या आत्मनिर्भर भारत का असली लाभ पूरे समाज को मिल रहा है या यह सीमित वर्ग के लिए अवसर का साधन बन चुका है? --- निष्कर्ष आत्मनिर्भर भारत का विचार निस्संदेह समय की आवश्यकता है। यह देश को मजबूत बनाने का मार्ग है। लेकिन इसे केवल नारे और प्रचार तक सीमित रखना जनता के विश्वास के साथ अन्याय होगा। प्रधानमंत्री जी यदि वास्तव में आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो उन्हें नीतियों में संतुलन लाना होगा। बड़े उद्योगों के साथ-साथ छोटे कारीगरों, किसानों और मझोले उद्यमियों को समान अवसर और संरक्षण देना होगा। तभी आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होगा और जनता का विश्वास कायम रहेगा। वरना इतिहास यही कहेगा कि – “आत्मनिर्भर भारत” जनता के लिए नारा था और “अदानीनिर्भर भारत” सत्ता की वास्तविकता। ✍️लेखक – दुर्गेश यादव!

सत्ता की राजनीति बनाम जनता के असली सवाल

संपादकीय : लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य जनता को सशक्त करना था, वही व्यवस्था आज जनता को आपस में उलझाकर...